Sunday, 16 September 2018

kanuga chapter seven


kanuga chapter six


kanuga chapter five


kanuga chapter four


kanuga chapter three


kanuga chapter two


kanuga chapter one

रमेश कनूगा ने ऑफिस से आते ही बैग मेज पर पटका , चाभी हुक  पर टांगी और गुसलखाने की और मुड़ा, वापिस  ड्राईंग रूम में आते ही उसने लकड़ी के दरवाजों में छिपे काले टीवी को नमस्कार किया  और सोफे पर धाम से बैठे ही कहा जय श्रीराम, प्राइम टाइम मनोरंजन में रामायण जो आ रही थी।
संयुक्त परिवार वाले भरे पुरे सिंधी घर में, रमेश कनूगा, उसकी बीवी शीला, बेटा नरोत्तम, सुधन्वा, गोविन्द और बेटी आशा उसकी माँ छतरी बाई और पिता गेड़ीमल के साथ बेथ कर सभ लोग रामायण का  रसास्वादन कर रहे थे.
रात के ९ बज गए और छत्रीबाई ने आवाज़ लगाई की बहु ' हाणे , मानी जो टाइम आहे. तू तैयारी कजायें '
जी मम्मी , कह कर उसने खाना लगा दिया.
गेड़ीमल लगभग चुप ही रहते थे,
पाकिस्तान के नवाबशाह के सिंध स्कूल में कभी हेडमास्टर होते थे , पर आज अपने घर की एक कमोडिटी भर रह  गए हैं , विभाजन की त्रासदी में उनका घर बार, परिवार नाती रिश्तेदार, दोस्त यार सब तो पीछे छूट गया था। अब बीसेक साल से उनका परिवार सीपरी बाजार , में झाँसी का फेमस सिंधी परिवार है।
पढ़े लिखे होने के कारण उनको सरकारी नौकरी भी मिली , पुलिस में , पर फ़िलहाल ये सेवानिवृत्त हैं।
खाली समय में लिखा करते है।  हर गुरूवार की शाम का बेसब्री से इन्तजार करते है , क्योंकि इनके घर के ठीक बाहर वाली मचान पर एक चौपाल सजती है , जहाँ लोग इनकी कहानियो के बड़े शौकियें है , यकीन मानिये, पुरे
हफ्ते में ये केवल यही बोलते हुए पाए जाते है, बहुत को मालुम भी  रहता है की कितने बजे हुक्का सजेगा और कितने बजे चौपाल सेट होगी / बहुत काम लोग ये बात जानते थे की गेड़ीमल अपने टाइम के बेहतरीन आशिक औ कवियों में से एक थे, जिन पर, नवाबशाह की सेकड़ो ललनाएं मरती थी. चौपाल पर गेड़ीमल जी के तहत देखते ही बनते थे , सरे आदमी एक तरफ और औरते एक तरफ,
समाज के दोनों ही हिस्से, लुत्फ़ लेते थे,  हुक्के की गड़गड़ाहट पर शायरी, मौसिकी और कहानियो के, कितने ही लोग इकट्टठा होते थे वहां पर जो ना जाने दिन भर क्या क्या काम करते थे , पर रात होते ही, मानो शायर, कवी या लेखक बन जाते  थे , जिनमे शायद कोई ठेली वाला, कोई नाई या कोई गृहणी होते थे, मानो सबको अभिव्यक्ति की आजादी थी,
वो ललनाएं  जो दिन भर दुपट्टे में छिपी बैठी रहती थी , शाम को न जाने कितने वीर, श्रृंगार और प्रेम रस के काफिये पढ़ जाती थी.
सीपरी बाजार में यूँ तो सिंधी परिवार ज्यादा रहते थे पर चौपाल हर तबके के लिए खुली थी , कोई भी बे रोकटोक आ सकता था  पढ़ सकता था अपनी रचना को , हाँ कोई कम्प्टीशन तो था नहीं, पर कोई आलोचना भी तो न होती थी, और अगली सुबह सब लोग अपने अपने कामो में लग जाते थे। जरुरी नहीं की लोग त्योहारों के मौको पर मिलते हो पर ये तो जरूर तय था की गुरूवार की रात को सब लोग चौपाल पर जरूर मिलेंगे ही मिलेंगे.
रमेश कनूगा ने भी पिता की तरह विभाजन की त्रासदी तो न देखि थी , पर वो निहायत ही प्रैक्टिकल या यूँ कहे अवसरवादी व्यक्ति था। गेड़ीमल के पुलिस से रिटायर होने के बाद, जॉब ऑफर हुई  तो थी रमेश को, ज्वाइन भी की उसने पर २ महीने की ट्रेनिंग में इतनी गन्दी गालियां, और दुर्व्यवहार उससे सीखा नहीं गया, शायद उसको टार्चर करना आता ही  नहीं था।  बहरहाल,  उसने ट्रेनिंग पीरियड में ही रिजाइन दे दिया , सबने खूब समझाया की ऐसा मौका फिर मिलेगा नहीं , पर वो माना नहीं,
अब पढ़ा लिखा तो था वो , पर झाँसी जैसे छोटे से शहर में नौकरियां भी बहुत ज्यादा तो न थी , खैर, कुछ महीनो के बाद घर वालो ने मानना कहना भी छोड़ दिया , छत्रीबाई को लगता था की सांड की नाक में  नकेल डाल  देने से सांड घरेलु हो ही जायेगा, और फिर खोज शुरू हुई एक श्रीमती की जो सेवा करे श्री रमेश जी की.
पर रमेश ने भी अनाउंस कर दिया था की जो भी हो, बिना रोजगार के वो शादी न करेगा और ये भी की  पहले उसकी बेहेन की शादी होगी , कुछ महीनो की मशक्कत के बाद उसको एक काम रास आया. सहनीबाज़ार पार्क की दीवार के साथ उन्होंने अपने बिज़नेस की शुरुआत की मात्र २० रुपये की पूंजी के साथ. एक आलिशान रेहड़ी जिस पर सजे थे कीमा कलेजी, खरोड़े और फिश फ्राई.  घरवालों ने खूब कोसा भी की दिल्ली जा के जॉब ही कर लो  पर रमेश भाई ठहरे रमेश भाई उन्होंने ये पक्का ही कर लिया की अब जो भी हो वो इसी बिज़नेस में ध्यान लगाएंगे, और दो दिन का साप्ताहिक अवकाश एक तो गुरूवार , अरे पिताजी की चौपाल जो है , और दूसरा मंगलवार, हनुमान जी से कौन लड़ेगा भला। 
धीरे धीरे रेहड़ी से ठेले होते गए और रमेश ने एक नौकर भी रख लिया, परसो, असली नाम परसुराम। अब पुरे झाँसी में रमेश की धाक थी , लोग दूर दूर से आते थे कनूगा के खरोड़े खाने , आज तक किसी को समझ न आया की क्या मसाले डालता था वो, और फिश पकोड़े उनकी तो बात ही क्या, तलने से पहले ही लोगो की भीड़ जुट जाती थी , आलम ये था की टोकन व्योस्था करनी पड़ी थी।  कई  मिठाई व्यापरी उसको घर जमाई बनाना चाहते थे , पर रमेश था ईमानदार, वो चाहता था की माँ बाप की मर्ज़ी से ही उसका ब्याह हो। 
और छत्रीबाई ने भोपाल के हिरदाराम नगर के नेवंदराम मास्टर की बेटी शीला से उसका ब्याह करा ही दिया.  बहुत खुश थे दोनों मियां बीबी क्योंकि, रमेश बिज़नेस माइंडेड आदमी था, अफेयर करने का उसको समय ही नहीं था,
एक नपी तुली अनुशासित जिंदगी में वो जीता था, पर शीला का ध्घ्यान भी बहुत रखता था, हर महीने में एक पिक्चर सिनेमा हॉल में उसे दिखने ले जाता था , शीला के लिए एहि एक ज़िन्दगी थी, जहाँ अपर उसे ऐसा लगता था की मानो ज़िन्दगी में सब कुछ हो, और कुछ नहीं.  रमेश की धंधे से घर की माली हालत सुधरने लगी, घर की मरम्मत के साथ ही मोटर गाडी भी आ गयी , बहुमंज़िला ईमारत के साथ, चौपाल भी पक्की कर दी गयी जहाँ पर बेहतर स्ट्रीट  ब्यौस्था कर दी गयी थी , टेंट और माइक्रोफोन के इंतेजामात के साथ, आज की चौपाल बहुत हाई स्टैण्डर्ड हो गयी थी , खैर गेड़ीमल को इन सब से कुछ लेना देना न था, ८० को पार करते, एक दिन वो नींद में ही पधार गए, और कुछ दिन में छत्रीबआई भी। 
धीरे धीरे घर का बंटवारा होने लगा, भाई बेहेन जहाँ दिल्ली में सेट होना चाहते थे, रमेश का मन झाँसी के बहार न लगता था , खैर, पैसे की दिक्कत तो थी नहीं कभी तो उसने भाई बहनो को दिल्ली में अच्छी जगह सेट करवा के, अपने बिज़नेस को और बढ़ा किया , १ थैली से ४ ठेले और चौराहे की एक छोटी दुकान, मियां बीबी के लिए सम्पूर्ण थी. समय पा कर शीला ने मुनीश और तन्वी को जन्म दिया।  धीरे धीरे बच्चे बढे होने लगे.  तन्वी जहाँ बहुत ही शांत गंभीर बच्ची थी , मुनसिह दूसरी और बहुत शरारती नटखट और दिमागी /बच्चा था , पर उसकी हरकतों से नुकसान तो काम ही होता था.  और फायदा बहुत,
रमेश हमेशा उसका साथ देता था, और उसको खुले दिमाग से पूरा बचपन जीने में साथ देता था।  हर रविवार शाम को दोनों बाप बेटे चुपके से बस सस्टैंड के पास कसाटा आइसक्रीम जो खाने जाते थे. चुपके से इसलिए, कियोंकि शीला गुस्सा करती थी , जो खाना है घर में  खाओ,घर में बनाओ , बहार के सामान से उसे ,चिढ थी.